उत्तराखंड राजभवन अपडेट: सोमवार से लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह बने राज्य के सबसे लंबे समय तक कार्यरत रहने वाले राज्यपाल

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उत्तराखंड के राजनैतिक और प्रशासनिक इतिहास में जुलाई का यह सप्ताह रिकॉर्डों के नाम रहने वाला है। एक तरफ जहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भाजपा के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड के राजभवन से भी एक ऐतिहासिक खबर सामने आई है। उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) अब आधिकारिक तौर पर राज्य के इतिहास में सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले गवर्नर बन गए हैं। उन्होंने करीब 19 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ते हुए देवभूमि के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया है।

उत्तराखंड के इतिहास में अब तक सबसे लंबे समय तक राज्यपाल रहने का गौरव सुदर्शन अग्रवाल के नाम दर्ज था। उन्होंने 8 जनवरी, 2003 को पद संभाला था और 28 अक्टूबर, 2007 तक कुल 1,755 दिनों तक राज्य के राज्यपाल के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं। लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने 15 सितंबर, 2021 को उत्तराखंड के आठवें राज्यपाल के रूप में शपथ ली थी। रविवार को उन्होंने राजभवन में अपने कार्यकाल के 1,755 दिन पूरे कर पूर्व राज्यपाल सुदर्शन अग्रवाल की बराबरी की और सोमवार को नया दिन शुरू होते ही वे आधिकारिक तौर पर उत्तराखंड के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले एकमात्र राज्यपाल बन गए। दिलचस्प बात यह है कि उत्तराखंड में इस समय शासन और राजभवन दोनों शीर्ष पदों पर कार्यकाल के नए कीर्तिमान स्थापित हो रहे हैं। जहाँ 4 जुलाई को पुष्कर सिंह धामी ने भाजपा की ओर से सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बनाया, वहीं आगामी 9 जुलाई को वे नारायण दत्त (एनडी) तिवारी के सबसे अधिक दिनों तक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहने के सर्वकालिक रिकॉर्ड को भी तोड़ने जा रहे हैं। इसी बीच राज्यपाल गुरमीत सिंह का यह रिकॉर्ड बनना राज्य के प्रशासनिक गौरव को और बढ़ाता है। उत्तराखंड के सबसे लंबे कार्यकाल वाले राज्यपाल बने लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह का जन्म 1 फरवरी, 1956 को पंजाब के अमृतसर स्थित जलाल उस्मान में एक देशभक्त परिवार में हुआ था। उनके पिता मोहन सिंह ने भारतीय सेना में और बड़े भाई ने भारतीय वायु सेना में देश की सेवा की। गुरमीत सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल कपूरथला से प्राप्त की। सेना में अपने 40 वर्षों के शानदार और पराक्रमी कार्यकाल के दौरान उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल, उत्तम युद्ध सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल और विशिष्ट सेवा मेडल जैसे शीर्ष सैन्य सम्मानों से नवाजा गया। वे 31 जनवरी, 2016 को भारतीय सेना के उप प्रमुख (वाइस चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सैन्य जीवन के दौरान उन्होंने जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में आतंकवाद विरोधी अभियानों का व्यापक नेतृत्व किया। इसके अलावा, उन्होंने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया। चीन के साथ सीमा विवादों को सुलझाने के लिए उन्होंने बीजिंग और शंघाई सहित कई शहरों का दौरा कर महत्वपूर्ण वार्ताओं में भाग लिया, तो वहीं सियाचिन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पाकिस्तान के साथ हुई उच्च स्तरीय सैन्य वार्ताओं में भी देश का पक्ष मजबूती से रखा। उनका यही विशाल प्रशासनिक और सामरिक अनुभव आज उत्तराखंड के राजभवन को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है।