उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा का 'आरक्षित दांव': 13 के साथ 2 सामान्य सीटों पर भी उतार सकती है एससी प्रत्याशी

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देहरादून। आगामी उत्तराखंड विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है। दलित वोट बैंक को साधने और राज्य में अपनी पैठ को और मजबूत करने के लिए पार्टी एक बड़ा राजनीतिक प्रयोग करने की योजना बना रही है। प्रदेश की 13 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों के अलावा, पार्टी दो सामान्य वर्ग की सीटों पर भी अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों को मैदान में उतारकर 'आरक्षित दांव' खेल सकती है।

प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी कड़ी में पार्टी अनुसूचित जाति समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए एक नई चुनावी रणनीति पर विचार कर रही है। पार्टी के अंदरखाने चर्चा है कि राज्य की 13 अनुसूचित जाति आरक्षित सीटों के अलावा दो सामान्य सीटों पर भी अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों को मैदान में उतारा जा सकता है। यदि यह रणनीति अमल में आती है तो भाजपा विधानसभा चुनाव में कुल 15 सीटों पर एससी प्रत्याशियों को मौका दे सकती है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, हाल के हल्द्वानी शुद्धिकरण विवाद को संगठन ने गंभीरता से लिया है। इस मुद्दे की चर्चा भाजपा की कोर कमेटी की बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के स्तर पर भी हुई। माना जा रहा है कि पार्टी अब इस पूरे घटनाक्रम के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव का आकलन कर रही है। इसी के साथ अनुसूचित जाति समाज के बीच संगठन की पैठ और मजबूत करने के विकल्पों पर भी मंथन चल रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो राज्य की 13 एससी आरक्षित सीटों में से नौ पर भाजपा और चार पर कांग्रेस के विधायक चुने गए थे। भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में इन 13 सीटों में से 11 पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2022 में उसका आंकड़ा घटकर नौ रह गया। वर्तमान में भाजपा के पास पुरोला, थराली, घनसाली, राजपुर रोड, पौड़ी, गंगोलीहाट, बागेश्वर, सोमेश्वर और नैनीताल की एससी आरक्षित सीटें हैं। वहीं बाजपुर, भगवानपुर, झबरेड़ा और ज्वालापुर सीटों पर कांग्रेस के विधायक हैं। खास तौर पर हरिद्वार जिले की तीनों एससी आरक्षित सीटों पर 2022 में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी, जबकि ऊधमसिंह नगर की बाजपुर सीट भी कांग्रेस के खाते में गई थी। 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तराखंड की कुल आबादी 1,00,86,292 थी, जिसमें अनुसूचित जाति की आबादी 18,92,516, यानी करीब 18.76 फीसदी थी। ऐसे में प्रदेश की राजनीति में एससी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। भाजपा की प्रस्तावित रणनीति के पीछे एक उद्देश्य आरक्षित सीटों पर पिछली स्थिति को और मजबूत करना है, तो दूसरा सामान्य सीटों पर एससी प्रत्याशियों को उतारकर इस समाज को व्यापक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संदेश देना माना जा रहा है। हालांकि अभी इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है। अगर पार्टी यह प्रयोग करती है तो यह 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सामाजिक समीकरण साधने की बड़ी रणनीति साबित हो सकता है। 13 आरक्षित सीटों से आगे बढ़कर सामान्य सीटों पर भी एससी प्रत्याशियों को मौका देने का फैसला चुनावी मुकाबले में नई राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है।